Manoj Muntashir Poem | मैं फिर भी तुमको चाहूंगा | Sahitya Tak
Manoj Muntashir Poem मैं फिर भी तुमको चाहूंगा

Manoj Muntashir Poem | मैं फिर भी तुमको चाहूंगा | Sahitya Tak

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  • Post last modified:September 17, 2019

Manoj Muntashir Poem | मैं फिर भी तुमको चाहूंगा | Sahitya Tak

Manoj Muntashir Poem | मैं फिर भी तुमको चाहूंगा | Sahitya Tak
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ये गलत बात है कि लोग यहां रहते हैं, मेरी बस्ती में तो अब सिर्फ मकां रहते हैं…से लेकर मनोज मुंतशिर ने अपनी यह मशहूर गज़ल पढ़ी-जूते फटे पहन कर आकाश पर चढ़े थे, सपने हर दम हमारी औकात से बड़े थे, जूते फटे पहनकर आकाश पर चढ़े थे, सपने हमारे हरदम औक़ात से बड़े थे, फिर भी नहीं किया था जमीन का सौदा, दो चार आसमान तो कदमों में गिर पड़े थे…फिल्मों के मशहूर गीतकार मनोज मुंतशिर ने साहित्य आजतक के मंच पर इन गज़लों के बीच मैं फिर भी तुमको चाहूंगा तक कई गीत सुनाए.
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